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Tuesday, October 16, 2012

जीवन यात्रा है


मैंने देखा जीवन की रवानी को
मैंने देखा पल-पल बढ़ती हुई कहानी को
चलते ही चलते मैंने नदिया से पूछ लिया-
यूँ कल-कल निनाद कैसे कर लेती हो ?
अपने जीवन में वेग कैसे भर लेती हो ?
उसने बताया, उसने समझाया-
मधुर ताप से मैंने अपने अंतस को है पिघलाया
विलग हुई हिमखंड से औ‘ चल पड़ी मैं यात्रा पर
क्योंकि जीवन यात्रा है।
छोड़ उसके तट को,
मैं चला, आगे बढ़ा
सहसा ठिठके पाँव, देखा- वृक्ष सब बिहँसे पड़े हैं।
प्रश्न पूछा, जीवन कैसे ? जबकि ये एकदम खड़े हैं
एक सुर में बोल उठे पेड़ सब सारी दिशा से-
हम खड़े हैं पर हमारी मुस्कुराहट डोलती है
हर दिशा में घूमकर वह प्राण सबमें घोलती है
बिहँसते हर प्राण में मैं कर रहा एक यात्रा हूं
क्योंकि जीवन यात्रा है।
घूमते फिरते चला मैं
पर्वतों के पार पहुंचा,
पर्वतों के पार पहंुचा बादलों के पास पहुंचा
तैरते बादल से पूछा-
हरीतिमा के देश में, तुमको किस दुख ने था घेरा
जो यहाँ एकांत निर्जन में बनाया अपना डेरा
विचरते रहते हो तुम, न ज्ञात तुमको पार है
चल रहा अंतस में तेरे क्यों ये हाहाकार है ?
सहसा चमकी एक विद्युत,
अपने अंतस की चमक से उसने तम का राज़ खोला
भावना के वेग में तड़पकर उसने ये बोला-
भार ढोता फिर रहा हूं
इस दिशा से उस दिशा तक
पार तो जाना नहीं है
मैं पिघलकर फिर बनंूगा
वेग नदी की भावना का
चल पड़ूंगा साथ उसके अपनी प्रिय यात्रा पर
क्योंकि जीवन यात्रा है।

5 comments:

  1. पार तो जाना नहीं है
    मैं पिघलकर फिर बनंूगा
    वेग नदी की भावना का
    चल पड़ूंगा साथ उसके अपनी प्रिय यात्रा पर
    क्योंकि जीवन यात्रा है।
    sahi kaha aapne jeevan to ek yatra hi hai
    rachana

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  2. नमश्कार शेख साहब! आपकी कविताएँ काफ़ी सुंदर है| आप सचमुच तारीफ के पात्र है| परंतु आज कल आपने लिखना क्यों बंद कर दिया? आपकी नयी कविताओं का इंतेजार रहेगा|

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  3. Namaskar sneha ji... tarif ke liye bahut bahut shukriya. Maine Maldijald hi nai Kavita post karne ki koshish karunga.

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