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Monday, July 11, 2011

झंझावात


झंझावात कितना प्रबल है!

दिशाएँ हो गईं निस्तब्ध,

नभ हो गया नि:शब्द,

सरस मधुर पुरवाई अपना दिखा गई भुजबल है।

झंझावात कितना प्रबल है!

शाखें हैं टूटी-टूटी,

सुमनों की किस्मत रूठी,

टप-टप बूँदों ने बेध दिया हर पत्ती का अंतस्थल है!

झंझावात कितना प्रबल है!

पंछी तिनके अब जुटा रहे,

चोटिल भावों को मिटा रहे,

दिन बीत गया अब रात हुई, यह जीवन नहीं सरल है!

झंझावात कितना प्रबल है!

विश्वास

तू देव था

तुझे पूजा करता था मैं

तेरे सामने आते ही

नत हो जाता था मस्तक मेरा

भर जाती थी स्फूर्ति

जग जाती थी नई चेतना।

आज तू निरा पत्थर बन गया है।

फिर भी जब गुजरता हूं तेरे दर से

पांव ठिठक जाते हैं

निगाह टिक जाती है तुझ पर

कैसे पत्थर कह दूं तुझे

विश्वास का नाता जो जुड गया है तुझसे।