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Monday, February 21, 2011

नेता की प्रिया

कवियों को आंखें झील सी वैभवशाली दिखती हैं
झूठे हैं वे, तो ये काली-काली मतवाली दिखती हैं
मधु को प्यासों को यह मदिरालय दिखती हैं
मुझको यह स्विस बैंक की मुख्यालय दिखती हैं
तेरी इन आंखों में काले धन का है स्वर्णिम जाल
एक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल।
इंटरेस्ट में मिली है जो तेरे होठों की मुस्कान
जाग उठा जीवन मेरा ज्यों पाई मुर्दे ने जान
इनके काले-काले रंगों में रंग गया है मन मेरा
अब ने इस जीवन में होगा दूजे रंग का बसेरा
तू ही बता तुझ पर मैं क्या-क्या न्यौछावर कर दूं
दिल करता है देश समूचा तेरे खाते में धर दूं।

नेता से साक्षात्कार

देखकर देश की हालत एक दिन आया एक विचार
चल कर एक दिन नेताजी का ले लें साक्षात्कार
मैंने पूछा नेताजी बात अंतर्मन की बताइए
जरा इन घोटालों का सिध्दांत तो समझाइए
नेता जी शांत भाव से बोले, अपना राजे दिल खोले
आप ठहरे साहित्यकार और पत्रकार
क्या जाने कैसे चलती है सरकार
हमारे ऊपर देश के विकास का भार है
घोटाला सिध्दांत इसका सबसे बड़ा आधार है
आप को पता नहीं हम देश के विकास का पारा ऊपर चढ़ा रहे हैं
घोटाला कर-करके देश का प्रतिव्यक्ति आय बढ़ा रहे हैं
हम जनता के प्रतिनिधि हैं जनता की नब्ज समझते हैं
इसीलिए जनता के हित सब घोटाला करते हैं
हमारी जनता आलसी है स्वयं नहीं कुछ करती है
देख तरक्की पास-पड़ोस की तभी वह आगे बढ़ती है
आप सोचते हैं हम अपने खाते में जोड़ बढ़ा रहे हैं
अरे, हम तो देखा-देखी आगे बढ़ने की होड़ लगा रहे हैं
हमारी ही तरह जब हर नागरिक आगे बढ़ जाएगा
हमारी तरह जब हर व्यक्ति आत्मनिर्भर बन जाएगा
हमारा देश अपने आप ही विकसित देश बन जाएगा।
हमारा देश अपने आप ही विकसित देश बन जाएगा।