Total Pageviews

Monday, July 11, 2011

झंझावात


झंझावात कितना प्रबल है!

दिशाएँ हो गईं निस्तब्ध,

नभ हो गया नि:शब्द,

सरस मधुर पुरवाई अपना दिखा गई भुजबल है।

झंझावात कितना प्रबल है!

शाखें हैं टूटी-टूटी,

सुमनों की किस्मत रूठी,

टप-टप बूँदों ने बेध दिया हर पत्ती का अंतस्थल है!

झंझावात कितना प्रबल है!

पंछी तिनके अब जुटा रहे,

चोटिल भावों को मिटा रहे,

दिन बीत गया अब रात हुई, यह जीवन नहीं सरल है!

झंझावात कितना प्रबल है!

2 comments:

  1. I like your poetry kamaruddin sahab.
    S.M.Masum
    jaunpur

    ReplyDelete
  2. kavita - bhav atyant prabal hai....aise likhna itna nahin saral hai.....bahuuuuuuuut sundar

    ReplyDelete