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Monday, July 11, 2011

विश्वास

तू देव था

तुझे पूजा करता था मैं

तेरे सामने आते ही

नत हो जाता था मस्तक मेरा

भर जाती थी स्फूर्ति

जग जाती थी नई चेतना।

आज तू निरा पत्थर बन गया है।

फिर भी जब गुजरता हूं तेरे दर से

पांव ठिठक जाते हैं

निगाह टिक जाती है तुझ पर

कैसे पत्थर कह दूं तुझे

विश्वास का नाता जो जुड गया है तुझसे।

5 comments:

  1. Aapki hindi aapki urdu ki tarah hi bahut acchhi hai.... Bahut hi sashakta bhav darshaye hain Sahab.. Badhai...

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  2. Bahut gahraii hai aapki soch or sabdon mein

    aapko padhna yakinan khushkismatii hai ,aajkal vaqt kuch jyada hi tej bhaag raha hai isliye lekhan or pathan se doori kuch jyada hai fursat mein aapke blog ki sair karenge


    bandhaii swikaren

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  3. कल 21/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा....
    इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जायेगा...

    बढ़िया रचना... सादर बधाई..

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