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Monday, March 7, 2011

यादों का कारवां

पलट के यादों ने दी सदा जो निगाह मेरी तड़प उठी है,
बौराए आमों पे बैठी कोयल चुपके-चुपके कुहक उठी है।
हवाओं ने तान छेड़ा ऐसा नदी में अब तो मची है हलचल,
नाखुदा भी है डगमगाया दिल में बिजली कड़क उठी है।
होड़ लगी परवाज़ की अब तो आसमान भी सिहर गया है,
दो परिंदों के मन में अब तो वफ़ा की खुशबू महक उठी है।
सो गईं संसार की आंखें, पर रात अभी तक रही अकेली,
चांद आया ज्यों पास उसके चांदनी अब छिटक उठी है।
हो गई ऋतु खूब सुहानी, ये यादों का कारवां चला है,
अब संभाले से ना संभलती, घटाएं अब तो बरस उठी हैं।

3 comments:

  1. यादों का कारवां अच्छा लगा

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  2. बढ़िया..बहुत अच्छी रचना...!ऐसे ही खूबसूरत रचनाएँ..लिखते रहिये....

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  3. achchha likha hai aapne....shubhakamnaye

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