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Monday, March 21, 2011

फुटपाथ पर बचपन



कोलकाता के एक चौराहे पर
टैªफिक सिग्नल ने प्रोजेक्टर की लाल बत्ती जलाई
टैक्सी में बैठा मैं
हवा के चित्रपट पर चल रही फिल्म देखने लगा।
कुछ बच्चे  नंगे पांव अधनंगे बदन
जो फुटपाथ पर उछल-कूछ कर रहे थे
अचानक हरकत में आ गए
लीन हो गए ऐसे खेल में
जो मेरी कल्पना से परे था।
टैªफिक पर रुकी हुई गाड़ियों के आगे-पीछे छिपकर
खेलने लगे  छुपा-छुपी का खेल।
प्रोजेक्टर ने हरी बत्ती जलाई
फिल्म का इंटरवल हुआ
बच्चे सड़क से फिर फुटपाथ पर
अपनी धुन में मस्त।
टैक्सी आगे बढ़ी
फिल्म का अगला हिस्सा बिना किसी प्रोजेक्टर के
नजरों के सामने था।
सामने था पिछड़े गांव में पला मेरा बचपन
धूल उड़ाती मोटरगाड़ी जब दिख जाती गांव में
धूल से सने बचपन के पांव में
मानो पंख लग जाते थे।
और लगती थी दौड़ गाड़ी के पीछे-आगे
मिल जाता आनंद का वह झोंका
जो गाड़ी में बैठकर महसूस नहीं किया जा सकता
आइस-बाइस का खेल भी खेलते थे हम
छुपने के ठिकाने हुआ करते थे-
घरों के दालान अलग सी पड़ी झोपड़ी
आम-नीम के पेड़ पुआलों के ढेर
अरहर के गट्ठर कुएं की जगत
और दौड़ लगाकर छुपने के लिए ढेर सारी जमीन।
फिल्म ने अपना सफर समाप्त किया
मन विचारों में डूब गया
हम तरसते थे एक गाड़ी देखने के लिए
इनका जीवन है गाड़ियों के इर्द-गिर्द।
धूल में सने हम तरसते थे सड़कों के लिए
धूल रहित सड़कें ही मैदान हैं इनके लिए।
प्रश्न जागा- किसकी तरस बड़ी है

Saturday, March 19, 2011

होली


रंग-बिरंगे रंगों से सज जाए संसार,
जीवन में छाया रहे प्यार का खुमार,
आंखों में बसी रहे फागुन की मस्ती,
गांव नगर झूम उठें झूमें हर बस्ती, 
होली में जुड जाएं हर दिल के तार,
मुबारक सभी को खुशी का त्योहार।

Monday, March 7, 2011

यादों का कारवां

पलट के यादों ने दी सदा जो निगाह मेरी तड़प उठी है,
बौराए आमों पे बैठी कोयल चुपके-चुपके कुहक उठी है।
हवाओं ने तान छेड़ा ऐसा नदी में अब तो मची है हलचल,
नाखुदा भी है डगमगाया दिल में बिजली कड़क उठी है।
होड़ लगी परवाज़ की अब तो आसमान भी सिहर गया है,
दो परिंदों के मन में अब तो वफ़ा की खुशबू महक उठी है।
सो गईं संसार की आंखें, पर रात अभी तक रही अकेली,
चांद आया ज्यों पास उसके चांदनी अब छिटक उठी है।
हो गई ऋतु खूब सुहानी, ये यादों का कारवां चला है,
अब संभाले से ना संभलती, घटाएं अब तो बरस उठी हैं।