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Friday, October 21, 2011

कता-



सुकून खोजने न जाने किस किस दर पहुंचा।
सुकून आया जब लौट कर के घर पहुंचा।
दिल ही मरहम है खुद दिल के जख्मों का
इलाज की खातिर यूं ही शहर शहर पहंुचा।

Monday, August 22, 2011

अन्ना का बलिदान //जाग उठा है हिंदुस्तान




जाग उठा है हिंदुस्तान।
सबके दिल में इक तूफान, अब तो मंजिल है आसान
जाग उठा है हिंदुस्तान।

बहुत दिनों तक थे हम सोए
भूल-भुलैया में थे हम खोए
नियमों का जकड़ा जंजाल
पार हुआ जो चल गया चाल
सिंहासन पर सब बेईमान, ये तो नहीं अपनी पहचान!
जाग उठा है हिंदुस्तान।

लात मारते पेट-पीठ पर
बने कसाई बैठ सीट पर
संविधान की दे-दे दुहाई
खा जाते सब पाई-पाई
तरस रही जनता नादान, कैसे मिले मुट्ठी भर धान?
जाग उठा है हिंदुस्तान।

प्रथम सभ्यता ज्ञाता भारत
जग का भाग्य विधाता भारत
फंसा हुआ चंगुल में ऐसे
चूजा चील के मुंह में जैसे
नोंच-नोंच खाएं शैतान कहां रही भारत की शान?
जाग उठा है हिंदुस्तान।

उठो चलो अब बहुत सो लिए
आंसू पोंछो बहुत रो लिए
अब जनता का राज चलेगा
नौकर मालिक नहीं बनेगा
क्या व्यर्थ होगा बलिदान? राक्षस बना रहेगा भगवान?
जाग उठा है हिंदुस्तान।

सबके दिल में इक तूफान, अब तो मंजिल है आसान
जाग उठा है हिंदुस्तान।

Tuesday, August 16, 2011

अन्ना के प्रति


जंग छिड़ी हक और बातिल की  दिल की आंखें खोल।
जय अन्ना अन्ना बोल।
दुश्मन है बड़ा सयाना
बुनता झूठ का ताना बाना
कर ले लाख मगर चतुराई
जनता अब मांगे भरपाई
किया है बहुत ही गोलमगोल  मगर अब खुलेगी सबकी पोल।
जय अन्ना अन्ना बोल।
देश की माटी मांगे न्याय
जनता को समझे हो गाय
किया है खूब ही खूब फरेब
बस अपनी भरते रहे हो जेब
चल अब गठरी अपनी खोल  बहुत ही कर ली आंख मिचोल।
जय अन्ना अन्ना बोल।
कर लो चाहे जितना खेल
भर लो चाहे जितना जेल
गिरोगे घुटनों के बल भाई
ये  सच्चाई  है  सच्चाई
अब मान लो सच्चे उनके बोल  इसी में जय तेरी अनमोल।
जय अन्ना अन्ना बोल।
जंग छिड़ी हक और बातिल की   दिल की आंखें खोल।
जय अन्ना अन्ना बोल।

अन्ना जी के समर्थन में-


बूढ़ा हिमालय खड़ा हुआ है अपना सीना ताने
टकराकर टूटेंगे भ्रष्टाचार के ताने - बाने।
झूठ और फरेब का तूफां चाहे जितना प्रबल है
अडिग खड़ा तूफानों में  सच्चाई ही संबल है।
पावन भारत की मिट्टी ने छेड़ी है इक तान
पाकर ही हम दम लेंगे अपनी खोई पहचान।
इस मिट्टी में अब हम ज़हर उगने देंगे
अन्ना तुम संघर्ष करो तुम्हें  झुकने देंगे।

Saturday, August 6, 2011

तेरी झलक .

अब कोई खयाल भी आता नहीं खयालों में

जब से समाया है तेरा खयाल मेरे खयालों में

इक जूनून सा तारी है दिल के आलम पर

तेरी ही चाह अब रहती है हर सवालों में

जमीं से आसमां तक फैला है एहसास तेरा

झलक तेरी ही नजर आती है हर उजालों में

बंद ऑंखों में भी दिखती है सूरत तेरी

तेरी ही बंदगी है मेरे हर आमालों में

सुकून पाता है 'क़मर' बज्म में तेरी आकर

वरना खो गया होता गम के अंधियालों में।

Monday, July 11, 2011

झंझावात


झंझावात कितना प्रबल है!

दिशाएँ हो गईं निस्तब्ध,

नभ हो गया नि:शब्द,

सरस मधुर पुरवाई अपना दिखा गई भुजबल है।

झंझावात कितना प्रबल है!

शाखें हैं टूटी-टूटी,

सुमनों की किस्मत रूठी,

टप-टप बूँदों ने बेध दिया हर पत्ती का अंतस्थल है!

झंझावात कितना प्रबल है!

पंछी तिनके अब जुटा रहे,

चोटिल भावों को मिटा रहे,

दिन बीत गया अब रात हुई, यह जीवन नहीं सरल है!

झंझावात कितना प्रबल है!

विश्वास

तू देव था

तुझे पूजा करता था मैं

तेरे सामने आते ही

नत हो जाता था मस्तक मेरा

भर जाती थी स्फूर्ति

जग जाती थी नई चेतना।

आज तू निरा पत्थर बन गया है।

फिर भी जब गुजरता हूं तेरे दर से

पांव ठिठक जाते हैं

निगाह टिक जाती है तुझ पर

कैसे पत्थर कह दूं तुझे

विश्वास का नाता जो जुड गया है तुझसे।

Monday, March 21, 2011

फुटपाथ पर बचपन



कोलकाता के एक चौराहे पर
टैªफिक सिग्नल ने प्रोजेक्टर की लाल बत्ती जलाई
टैक्सी में बैठा मैं
हवा के चित्रपट पर चल रही फिल्म देखने लगा।
कुछ बच्चे  नंगे पांव अधनंगे बदन
जो फुटपाथ पर उछल-कूछ कर रहे थे
अचानक हरकत में आ गए
लीन हो गए ऐसे खेल में
जो मेरी कल्पना से परे था।
टैªफिक पर रुकी हुई गाड़ियों के आगे-पीछे छिपकर
खेलने लगे  छुपा-छुपी का खेल।
प्रोजेक्टर ने हरी बत्ती जलाई
फिल्म का इंटरवल हुआ
बच्चे सड़क से फिर फुटपाथ पर
अपनी धुन में मस्त।
टैक्सी आगे बढ़ी
फिल्म का अगला हिस्सा बिना किसी प्रोजेक्टर के
नजरों के सामने था।
सामने था पिछड़े गांव में पला मेरा बचपन
धूल उड़ाती मोटरगाड़ी जब दिख जाती गांव में
धूल से सने बचपन के पांव में
मानो पंख लग जाते थे।
और लगती थी दौड़ गाड़ी के पीछे-आगे
मिल जाता आनंद का वह झोंका
जो गाड़ी में बैठकर महसूस नहीं किया जा सकता
आइस-बाइस का खेल भी खेलते थे हम
छुपने के ठिकाने हुआ करते थे-
घरों के दालान अलग सी पड़ी झोपड़ी
आम-नीम के पेड़ पुआलों के ढेर
अरहर के गट्ठर कुएं की जगत
और दौड़ लगाकर छुपने के लिए ढेर सारी जमीन।
फिल्म ने अपना सफर समाप्त किया
मन विचारों में डूब गया
हम तरसते थे एक गाड़ी देखने के लिए
इनका जीवन है गाड़ियों के इर्द-गिर्द।
धूल में सने हम तरसते थे सड़कों के लिए
धूल रहित सड़कें ही मैदान हैं इनके लिए।
प्रश्न जागा- किसकी तरस बड़ी है

Saturday, March 19, 2011

होली


रंग-बिरंगे रंगों से सज जाए संसार,
जीवन में छाया रहे प्यार का खुमार,
आंखों में बसी रहे फागुन की मस्ती,
गांव नगर झूम उठें झूमें हर बस्ती, 
होली में जुड जाएं हर दिल के तार,
मुबारक सभी को खुशी का त्योहार।

Monday, March 7, 2011

यादों का कारवां

पलट के यादों ने दी सदा जो निगाह मेरी तड़प उठी है,
बौराए आमों पे बैठी कोयल चुपके-चुपके कुहक उठी है।
हवाओं ने तान छेड़ा ऐसा नदी में अब तो मची है हलचल,
नाखुदा भी है डगमगाया दिल में बिजली कड़क उठी है।
होड़ लगी परवाज़ की अब तो आसमान भी सिहर गया है,
दो परिंदों के मन में अब तो वफ़ा की खुशबू महक उठी है।
सो गईं संसार की आंखें, पर रात अभी तक रही अकेली,
चांद आया ज्यों पास उसके चांदनी अब छिटक उठी है।
हो गई ऋतु खूब सुहानी, ये यादों का कारवां चला है,
अब संभाले से ना संभलती, घटाएं अब तो बरस उठी हैं।

Monday, February 28, 2011

जिन्दगी

भावनाओं से, जिन्दगी की गाड़ी चलती नहीं,
भावशून्य दौड़ती गाड़ी को क्या जिन्दगी कहूं?
दर्द से जिन्दगी, बहुत दुशवार हो जाती है,
दर्द न महसूस हो, तो क्या दिल उसे कहूं?
दौड़ता रहा तलाश में, उम्र भर इधर-उधर,
सो गया थकन ओढ़ के, मंजिल इसे कहूं?

Monday, February 21, 2011

नेता की प्रिया

कवियों को आंखें झील सी वैभवशाली दिखती हैं
झूठे हैं वे, तो ये काली-काली मतवाली दिखती हैं
मधु को प्यासों को यह मदिरालय दिखती हैं
मुझको यह स्विस बैंक की मुख्यालय दिखती हैं
तेरी इन आंखों में काले धन का है स्वर्णिम जाल
एक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल।
इंटरेस्ट में मिली है जो तेरे होठों की मुस्कान
जाग उठा जीवन मेरा ज्यों पाई मुर्दे ने जान
इनके काले-काले रंगों में रंग गया है मन मेरा
अब ने इस जीवन में होगा दूजे रंग का बसेरा
तू ही बता तुझ पर मैं क्या-क्या न्यौछावर कर दूं
दिल करता है देश समूचा तेरे खाते में धर दूं।

नेता से साक्षात्कार

देखकर देश की हालत एक दिन आया एक विचार
चल कर एक दिन नेताजी का ले लें साक्षात्कार
मैंने पूछा नेताजी बात अंतर्मन की बताइए
जरा इन घोटालों का सिध्दांत तो समझाइए
नेता जी शांत भाव से बोले, अपना राजे दिल खोले
आप ठहरे साहित्यकार और पत्रकार
क्या जाने कैसे चलती है सरकार
हमारे ऊपर देश के विकास का भार है
घोटाला सिध्दांत इसका सबसे बड़ा आधार है
आप को पता नहीं हम देश के विकास का पारा ऊपर चढ़ा रहे हैं
घोटाला कर-करके देश का प्रतिव्यक्ति आय बढ़ा रहे हैं
हम जनता के प्रतिनिधि हैं जनता की नब्ज समझते हैं
इसीलिए जनता के हित सब घोटाला करते हैं
हमारी जनता आलसी है स्वयं नहीं कुछ करती है
देख तरक्की पास-पड़ोस की तभी वह आगे बढ़ती है
आप सोचते हैं हम अपने खाते में जोड़ बढ़ा रहे हैं
अरे, हम तो देखा-देखी आगे बढ़ने की होड़ लगा रहे हैं
हमारी ही तरह जब हर नागरिक आगे बढ़ जाएगा
हमारी तरह जब हर व्यक्ति आत्मनिर्भर बन जाएगा
हमारा देश अपने आप ही विकसित देश बन जाएगा।
हमारा देश अपने आप ही विकसित देश बन जाएगा।

Wednesday, January 19, 2011

नव वर्ष आपको मंगलमय हो

नव वर्ष आपको मंगलमय हो।

हर दुख हर बाधा पर जय हो

नव वर्ष आपको मंगलमय हो।

 

दे न सके जो साल पुराने

प्रश्न रहे जाने-अनजाने

लहरों पर नए उत्तर आएं

काले बादल मोती बरसाएं

समय का सागर सा हृदय हो

नव वर्ष आपको मंगलमय हो।

 

मुसकाए हर सुबह की लाली

स्वप्न भरी हो निशा अंधियाली

पग-पग आशाओं से भरा हो

हर पल दिल का बाग हरा हो

जीवन का हर क्षण निर्भय हो

नव वर्ष आपको मंगलमय हो।

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