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Monday, December 13, 2010

Teen Ghazalen

तूफाँ

ख्वाबों खयालों मे आने लगे हैं
दिल को मेरे सताने लगे हैं
मैं दूर जाऊँ तो जाऊँ कैसे
नजदीक इतना वो आने लगे हैं
समंदर में उतरकर देखा जो उसको
वो अंधेरे मुझे रास आने लगे हैं
जाके टिकती है कश्ती अब देखो कहाँ ?
धारा उल्टी है, तूफाँ भी आने लगे हैं।


याद

हर पल सताती है तेरी याद क्या करूँ
पहुँचती नहीं मंजिल तक फरियाद क्या करूँ
इक आस लगा रखी है जज्बात से तेरे
लोगों ने उसे भी कर रखा बरबाद क्या करूँ
झूम उठती है तबस्सुम जब तेरे लबों पर
हो जाता है दिल मेरा आबाद क्या करूँ?

तेरा अक्स

बस गया है जेहन में तेरा अक्स ऐसा
हर हरफों में अब बस तू ही दिखती है
ये नदिया ये झरने ये समंदर की लहरें
देखूँ चाहे जो भी सूरत तेरी ही उभरती है।
ऐसा कुछ है खास मेरे महबूब का जलवा
नज़र उठी भी नहीं, ग़ज़ल खुद ही बनती है।

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