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Monday, December 13, 2010

लहर उठ-उठ कर चलती है।

एक पल गिरकर वह शांत हुई,

पर कभी नहीं वह क्लांत हुई,

उठती-गिरती, गिरती-उठती, मंजिल तक अपने पहँचती है।

लहर उठ-उठ कर चलती है। 

जीवन में एक रवानी है,

इसकी बस यही कहानी है,

बहती रहती है देखो नदी, कब किसके रोके रुकती है ?

लहर उठ-उठ कर चलती है। 

बादल मोती बरसारता है,

जीवन की राग सुनाता है,

चम-चम करती देखो चपला, घनघोर अंधेरा चीरती है।

लहर उठ-उठ कर चलती है। 

मधुकर ने अब गुंजार किया,

प्रकृति ने खूब सिंगार किया,

कूक-कूक कहती कोयल अब तम की चादर फटती है। 

जीवन की है राह विकट,

पर है राही तू बड़ा जीवट,

बढ़ते रहना है लक्ष्य तेरा, हर बाधा तुझसे हहरती है।

लहर उठ-उठ कर चलती है। 

उठ जाग रे राही! सोया है क्यों ?

झूठे सपनों में खोया है क्यों ?

नींद में रहकर मंजिल भी क्या कभी किसी को मिलती है ?

लहर उठ-उठ कर चलती है।

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