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Monday, December 13, 2010

कवि-पत्नी की व्यथा

पत्नी जी अति प्रेम में विह्वल कह गईं दिल की बात!

हे प्रिय! क्या तुम दोगे मुझको कविता की सौगात!

पत्नी को खुश करने का यह अच्छा अवसर पाया,

फिर क्या था !

पति महोदय का कवि मन फड़फड़ाया,

सितारों का एक चक्कर लगाया,

प्रिया के मुखमंडल को निहारा,

प्रकृति से सुंदर रूपों को विचारा,

भावनाएँ साँचे में ढलने लगीं,

गीतों की कड़ियाँ निकलने लगीं,

कवि जी लग गए प्रिया का मन बहलाने,

हर प्रहर में एक -एक कविता लगे सुनाने,

कविता की स्रोतस्विनी फूट पड़ी।

पर यह क्या? पत्नी जी तो रूठ पड़ीं!

मुखमंडल पर भरकर तेज, बोलीं-

अरे! अब रात दिन कविता ही बनाओगे!

नींद से जगा-जगा कर सुनाओगे!

वैसे ही ज़िन्दगी में कहाँ आराम है?

घर में और भी ढेरों काम हैं।

अरे! मैं तो कभी-कभार एक दो लाइन सुनाने को बोली थी-

वह कौन सी मनहूस घड़ी थी, जो मैं अपना मुँह खोली थी।

मैंने कुछ मोती चुनने को कहा था - यह पत्थरों का ढेर नहीं।

मैंने सोया हुआ कवि जगाना चाहा था, सोया हुआ शेर नहीं।

मैंने सोया हुआ कवि जगाना चाहा था........, सोया हुआ शेर नहीं।

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