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Monday, December 13, 2010

सागर हूँ मैं

टूट कर बिखरा हुआ एक पत्थर हूँ मैं

राह में अनजान पड़ा हूँ, बेघर हूँ मैं।

लोगों ने ऑंसुओं के दरिया बहा दिए,

सब पीता गया, तभी तो सागर हूँ मैं।

मैं चला था धारा बन मंजिले मकसूद को,

वक्त ने ऐसा घुमाया, बन गया भँवर हूँ मैं।

ख्वाब की चादर बुनी छाँव पाने के लिए,

खिंच गई वह भी, आज नंगे सर हूँ मैं।

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