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Monday, December 13, 2010

बादल गरज-गरज रह जाते!

नभ के हर कोने में जाना,

टकराकर फिर वापस आना,

प्रिय की विह्वलता में, वे अपना अस्तिस्व मिटाते।

बादल गरज-गरज रह जाते!       

देख न ले निश्ठुर जग सारा,

बिछुड़न फिर न मिले दुबारा,

रूप बदलकर अपना, वे प्रिय ऑंचल में छिप जाते। 

पौध उगाएँ धरती पर,

फूल खिलाएँ परती पर,

प्रिय की हर सुंदरता में, अपना हाथ बँटाते।

बादल गरज-गरज रह जाते!

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