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Monday, December 13, 2010

तेरी झलक

अब कोई खयाल भी आता नहीं खयालों में

जब से समाया है तेरा खयाल मेरे खयालों में

इक जूनून सा तारी है दिल के आलम पर

तेरी ही चाह अब रहती है हर सवालों में

जमीं से आसमां तक फैला है एहसास तेरा

झलक तेरी ही नजर आती है हर उजालों में

बंद ऑंखों में भी दिखती है सूरत तेरी

तेरी ही बंदगी है मेरे हर आमालों में

सुकून पाता है 'क़मर' बज्म में तेरी आकर

वरना खो गया होता गम के अंधियालों में।

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