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Monday, December 13, 2010

अंधेरे में

अंधेरे में कैद बैठा मैं चुपचाप

नहीं कहीं कोई पदचाप

नीरवता ऐसी कि याद दिला जाए-

इसके पहले यहाँ तूफ़ान कोई आया था।

जल रहा था एक दीप यहाँ

अंधेरे से लड़ने के लिए

उस अंधेरे से- जो सोख लेता सब कुछ

अपने काले सोख्ते से

चिड़िया की चहचहाहट, सूरज की रोशनी

फूलों की मुस्कुराहट, चाँद की चाँदनी।

उसे हवा के थपेड़ों ने बुझाया था

मसल दी थी उसके लौ को, बत्ती को भी

खेल ही खेल में काले सोख्ते ने सोख लिया

लौ की मिठास को।

अंधेरा और भी घना हो गया

अपने हाथों की अंगुलियाँ भी नहीं दिख रहीं

नहीं दिख रही कमरे की दीवारें

अंधेरे में कैद बैठा मैं चुपचाप

सुन रहा हूँ नीरवता की पदचाप

सुन रहा हूँ कोई आहट

जो धीरे-धीरे प्रवेश करता है अंधेरे में

कोई सूरत नज़र नहीं आ रही

पर देखता हूँ अचानक बाती से लौ फूट पड़ती है

       पास जाकर देखा-

       दीप गिरा नहीं था

       दीप में स्नेह अभी बाकी था

       जो अनुभूति की लौ पाकर

       फिर से जल उठा है।

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