Total Pageviews

Monday, December 13, 2010

आज सो न सका सारी रात!

खिड़की के पट खुल जाते थे,

परदे भी राग सुनाते थे,

सर्द हवा के झोंके लाते, यादों की बारात!

आज सो न सका सारी रात!

यह खेल बड़ा ही निराला था,

मैंने खुद से कह डाला था,

और सुनाता मैं किसको? अपने घायल जज्बात!

आज सो न सका सारी रात! 

चाँद सो गया बादल में,

तारे छिप गए ऑंचल में,

सारा जग था मौन हुआ, मैं किससे करता बात!

आज सो न सका सारी रात!

No comments:

Post a Comment