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Monday, December 13, 2010

ऐसा क्यों होता है?

ऐसा क्यों होता है?

ऐसा मन में क्यों होता है कि- 

खेलूँ ऊँची-ऊँची लहरों के साथ,

तैरूँ उसके शिखर तक, और

फिर बिखर जाऊँ छोटी-छोटी बूँदें बन के!

भुला दूँ अपने व्यक्तित्त्व को,

मिटा दूँ अपने अस्तिस्व को,

समा जाऊँ! इस असीम, अथाह, अतल जल में।

ऐसा क्यों होता है?

 

ऐसा क्यों होता है कि-

उभर आती हैं सदाएँ सूनेपन में

जो दिख रहा है उसे देता हूँ सदा,

नहीं है कोई प्रतिध्वनि।

शीतल बयार झकझोरती है तन को, मन को!

सपने में खोया मन!

एहसास जगाती शबनमी छुवन

ऑंखों में तिरती मोतियों की चमक

विलीन हो जाती है असीम, अथाह, अंतस्तल में।

ऐसा क्यों होता है?

ऐसा क्यों होता है?

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