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Monday, December 13, 2010

आ गया नव वर्ष

ले बहारों की उमंगे आया है नव वर्ष।

उठती -उठती ये तरंगे लाया है नव वर्ष।

एक नए उल्लास से गाकर नया एक गीत,

जोड़ लो अपने सुरों को प्रकृति देती संगीत,

भर लो जीवन की लहर में एक नया उत्कर्ष।

ले बहारों की उमंगे आया है नव वर्ष,

 

जिन्दगी के सफर में कभी न हिम्मत हार,

गर तुम्हारी नाव आकर फँस गई मँझधार,

देखो किनारा पास कितना दे रहा ललकार,

देखते क्या हो उठाओ एक नई पतवार।

हौसले से जीत लोगे जीवन का यह संघर्ष।

भर लो जीवन की लहर में एक नया उत्कर्ष।

ले बहारों की उमंगे आया है नव वर्ष।

 

जोड़ लो तुम हर हृदय से अपने मन की प्रीति,

गर मिटाना चाहते हो अपने अंतस की भीति,

क्या मिटा पाएगा है तुमको यह निष्ठुर संसार,

यदि स्वयं उनके लिए मिटने को  तुम तैयार,

लोग तुमसे जुड़ ही जाएँगें आकर सहर्ष।

भर लो जीवन की लहर में एक नया उत्कर्ष।

ले बहारों की उमंगे आया है नव वर्ष।

 

हर घड़ी मंगल घड़ी है,जीत द्वारे पर खड़ी है,

खोल उठकर द्वार अब,बीच में बस एक कड़ी है,

बैठकर बेकार में भाग्य को क्या कोसते हो?

जागो उठो अब, बैठकर यूँ भला क्या सोचते हो?

ऐसा सुनहरा अवसर तुम पाओगे नहीं प्रतिवर्ष।

भर लो जीवन की लहर में एक नया उत्कर्ष।

ले बहारों की उमंगे आया है नव वर्ष।     

राम रतन की लूट है

राम रतन की लूट है लूट सके तो लूट!

दुकानदार हर मेल में लूटे

चालाकी से सेल में लूटे

थानेदार भी जेल में लूटे

मंत्री खेल-खेल में लूटे

         क्यों चिल्लाता बेवकूफ सा ' किस्मत गई है फूट'

         अरे! राम रतन की लूट है लूट सके तो लूट!

हर दफ्तर में बाबू लूटे

साहब तो बेकाबू लूटे

जज साहब भी चैन से लूटे

हर कोई जेंटिलमैन सा लूटे

         कलयुग के सब संन्यासी भी भला क्यों जाएँ छूट ?

         अरे! राम रतन की लूट है लूट सके तो लूट!

आह्वान

देखकर छाया हुआ सर्वत्र भ्रष्टाचार

लेखनी भी है उगलती अब अग्नि की धार

जिंदा रक्त चूस-चूस जिंदा हैं जो नरभक्षी

धरा पर उन्हें भी क्या जीने का अधिकार ? 

छीन दूध शिशु-मुख से जिसने महल ताने

बेचते हैं मौत को जो प्राण रक्षा के बहाने।

लाश के अंबार पर जो खिलखिला कर हँस रहे

क्या उसे भी आज हम इस युग का इंसान मानें ? 

जिंदगी का मोल समझे एक पत्ती से भी कम

है नहीं एहसास उनको मौत में कितना है गम

अब समय है आ गया आओ मिलें एक साथ में

देख लें कि झूठ की है बाजुओं में कितना दम?

अंधेरे में

अंधेरे में कैद बैठा मैं चुपचाप

नहीं कहीं कोई पदचाप

नीरवता ऐसी कि याद दिला जाए-

इसके पहले यहाँ तूफ़ान कोई आया था।

जल रहा था एक दीप यहाँ

अंधेरे से लड़ने के लिए

उस अंधेरे से- जो सोख लेता सब कुछ

अपने काले सोख्ते से

चिड़िया की चहचहाहट, सूरज की रोशनी

फूलों की मुस्कुराहट, चाँद की चाँदनी।

उसे हवा के थपेड़ों ने बुझाया था

मसल दी थी उसके लौ को, बत्ती को भी

खेल ही खेल में काले सोख्ते ने सोख लिया

लौ की मिठास को।

अंधेरा और भी घना हो गया

अपने हाथों की अंगुलियाँ भी नहीं दिख रहीं

नहीं दिख रही कमरे की दीवारें

अंधेरे में कैद बैठा मैं चुपचाप

सुन रहा हूँ नीरवता की पदचाप

सुन रहा हूँ कोई आहट

जो धीरे-धीरे प्रवेश करता है अंधेरे में

कोई सूरत नज़र नहीं आ रही

पर देखता हूँ अचानक बाती से लौ फूट पड़ती है

       पास जाकर देखा-

       दीप गिरा नहीं था

       दीप में स्नेह अभी बाकी था

       जो अनुभूति की लौ पाकर

       फिर से जल उठा है।

हिंदी

जन-गण के मन की उद्गार यह हिंदी

माँ भारती के माथे की शृंगार यह हिंदी

हर बच्चे के लिए माँ की दुलार यह हिंदी

हर हिंदी के दिल की है प्यार यह हिंदी

दुश्मन ऑंख उठाए तो ललकार यह हिंदी

हिंद के हर सैनिक की हथियार यह हिंदी

       क्यों झिझकते हो बता दो सभी को शान से

है देश के विकास की आधार यह हिंदी

बिहार में बाढ़

कोसी ने कोसों तक लील लिया गाँव को

पंछी के छाँव को , जीवन के ठाँव को

दूर तक देखो जहाँ, पानी ही पानी है

डूबे ये आशियाँ कहते दर्द की कहानी हैं

डूब गए खेत सब डूब गई साँस भी

डूब गई सपनों में जीने की आस भी

ख्वाबों की दुनिया

ख्वाबों की दुनिया कितनी रंग-बिरंगी होती है।

      मन उड़ जाता है बाँध के पर

      फिर उड़ता रहता ऊपर-ऊपर

      सारे जहाँ की रंगत सब उसकी मुट्ठी में होती है।

ख्वाबों की दुनिया कितनी रंग-बिरंगी होती है।

प्रथम सुमन

बगिया के तुम प्रथम सुमन सौरभ से जग महकाना

सब जगह भागम-भाग मची है

जग-जंगल में आग लगी है

     जलते जग पर बादल बन तुम प्रेम सुधा बरसाना

          बगिया के तुम प्रथम सुमन सौरभ से जग महकाना

इतने वर्षों तक जिसने तुमको पाला पोसा

उसकी ऑंखों में देखो,तुमसे है एक भरोसा

     तन-मन अर्पित कर तुम उसकी आन बचाना

         बगिया के तुम प्रथम सुमन सौरभ से जग महकाना

उच्च शिखर आह्वान कर रहा

नवोदय भी यही जोश भर रहा

है कर्मभूमि यह कर्म करो, कहीं स्वप्नों में न रह जाना।

बगिया के तुम प्रथम सुमन सौरभ से जग महकाना

तेरा रूप

किलकारियों से भरे ऑंगन सी लगती हो

ऑंखों में बसे हुए ऑंजन सी लगती हो

मस्ती में झूम रहे फूलों को चूम रहे

बगिया के भँवरे की गुंजन सी लगती हो

झूम उठती हो तबस्सुम की बाँहों में जब

दूब पर मचलती हुई शबनम सी लगती हो।

दर्द

दर्द बढ़ते-बढ़ते बन गया है नश्तर अब तो  

जिया नहीं जाता दिल पे रख के पत्थर अब तो

नहीं सही जाती है पल-पल बढ़ती ये अगन

साँसें भरकर] कर दो राख जिगर अब तो   

देखी है जब से मैंने यार की भोली नज़रें

भाता नहीं ख्वाब में भी कोई मंजर अब तो

या खुदा! खूब बनाई है मुहब्बत तूने

दायरे में रह नहीं पा रहा सागर अब तो।

बँटवारा

बाँट दिया कुछ लोगों ने भाई-भाई का प्यार,

हिस्से में सबके ही आया लाशों का अंबार,

जी भर-भर कर सबने लाख कोशिशें कर ली,

मगर तोड़ न पाया दिल के रिश्तों का तार,

दु:स्वप्न समझकर भूले जो बीत गई है बात,

चलो चलें अपने गाँवों में अब डाले हाथ में हाथ।

क़लम

      जब तक क़लम है बाकी इंसा क्यों घबराए?

क़लम है अपनी साथी तो बंदूक क्यों उठाए?

कलम से यारों बदली है दुनिया की तस्वीर,

कलम ही यारों बदलेगी दुनिया की तकदीर,

कलम चलाना ही है सच्चे वीरों का अभिमान

कलम से आओ बता दें सबको इंसां की पहचान।

गीत प्यार के गाता चल

बदलेगी भारत की तस्वीर तू रंग में रंग मिलाता चल

राह में दुश्मन आएं तो उनको भी गले से लगाता चल

चिंता में पड़ा है जग सारा कैसे जीतूँ इस दुनिया को

तू जीत ले सबके दिल को ही, गीत प्यार के गाता चल।

चातक

संध्या की पावन बेला में सब दुख रहा भुलाना

सभी दिशाओं में छाया खुशियों का ताना बाना

ऑंखों में सुंदर सपनों का इंद्रजाल है छाया

भाग्य जगे हैं जो अपने घर में आपको पाया

प्यास से व्याकुल चातक जैसे ताके नैन बिछाए

हम भी वैसे आकुल थे कब दर्शन आपके पाएं ?

हम तो खाली सीपी थे, आप स्वाति बनके आए

मन के कोने-कोने में मोती की निधि बरसाए।

एहसास

अब तो बस यही एहसास रहता है

हर वक्त वो मेरे आस पास रहता है

बच्चों सी जिद और चिड़ियों सा चहकना

खिलौनों को देखकर यूँ उसका बहकना

खुशियाँ लुटाता वो सारे जहाँ में ,

दिल उसका फिर क्यों उदास रहता है?

है चाह कि समेटूँ हर छोटी छोटी खुशियाँ

अरमान है बिछा दूँ राहों में उनकी अँखियाँ

हर राह क्यूँ है सूनी, क्यों अधूरा साथ रहता है?

अब तो बस यही एहसास रहता है

हर वक्त वो मेरे आस पास रहता है

तू सोलह की हो ली

हालत ये देखकर तेरी भोली भोली

लगता है जैसे तू सोलह की हो ली

पलकें ये कहती हैं दिल में छुपाऊँ

दिल ये कहता है सासों में बसाऊँ

चितवन हो गई है कितनी शरमीली

लगता है जैसे तू सोलह की हो ली

रातों को जागे है मीठे सपनों में खोए

मनवा तेरा अब न एक पल भी सोए

धड़कन हर पल ढूँढ़े अपनी हमजोली

लगता है जैसे तू सोलह की हो ली

दिल बना दुश्मन अब हर पल सताए

शिकायत भी उसकी जुबाँ पे न आए

भींग गया तन मन है खेली जैसे होली

लगता है जैसे तू सोलह की हो ली

सागर हूँ मैं

टूट कर बिखरा हुआ एक पत्थर हूँ मैं

राह में अनजान पड़ा हूँ, बेघर हूँ मैं।

लोगों ने ऑंसुओं के दरिया बहा दिए,

सब पीता गया, तभी तो सागर हूँ मैं।

मैं चला था धारा बन मंजिले मकसूद को,

वक्त ने ऐसा घुमाया, बन गया भँवर हूँ मैं।

ख्वाब की चादर बुनी छाँव पाने के लिए,

खिंच गई वह भी, आज नंगे सर हूँ मैं।

तेरा इरादा जवाँ होता है।

सुबह की लाली में फूलों की डाली में

कोयलिया मतवाली में तेरा अक्स बयाँ होता है।

नदियों की कल-कल में, झरनों की छल-छल में

हवाओं की हलचल में तेरा जुनूँ रवाँ होता है।

चाँद के फलक में, सितारों की झलक में

जुगनुओं की चमक में तेरे नूर का समाँ होता है।

मन की लगन में, ऑंखों की तड़पन में,

दिल की चुभन में तेरा इरादा जवाँ होता है।

परिवर्तन

काँटों में रहकर हँसते सुमनों की लिखो कहानी।

तिनका-तिनका चुनकर घर प्यारा सा एक बनाया,

निठुर हवा के झोंके ने एक पल में सब बिखराया,

फिर चोंच में दाबी तिनका, चिड़िया हार न मानी।

काँटों में रहकर हँसते सुमनों की लिखो कहानी।

 

रात की काली ऍंधियारी ने सूरज का साम्राज्य लिया,

प्रात हुई फिर सूरज ने नव किरणों से शृंगार किया,

मुरझाए फूलों के अधर कहते फिर  नई कहानी

काँटों में रहकर हँसते सुमनों की लिखो कहानी।

 

कल-कल करती सरिता चट्टानों से टकराती,

गिरती उठती रहती पर कितनी वेगवती बन जाती,

ऊँचे पर्वत से गिरकर गाते झरनों की देखो रवानी।

काँटों में रहकर हँसते सुमनों की लिखो कहानी।

 

उथल-पुथल जीवन की गति, इससे क्या घबराना,

पतझर बीता, फिर उपवन ने पहना सुंदर बाना,           

भ्रमर करे गुंजार पुन:, कोयल कूके मधुरी बानी।

काँटों में रहकर हँसते सुमनों की लिखो कहानी।

 

रोती ऑंखों को जग ने चाहा है और रुलाना,

ऐसे जग को दिखलाने को क्यों है अश्रु बहाना!

परिवर्तन है नियम प्रकृति का, फिर क्यों हार है मानी ?

काँटों में रहकर हँसते सुमनों की लिखो कहानी।

तेरी झलक

अब कोई खयाल भी आता नहीं खयालों में

जब से समाया है तेरा खयाल मेरे खयालों में

इक जूनून सा तारी है दिल के आलम पर

तेरी ही चाह अब रहती है हर सवालों में

जमीं से आसमां तक फैला है एहसास तेरा

झलक तेरी ही नजर आती है हर उजालों में

बंद ऑंखों में भी दिखती है सूरत तेरी

तेरी ही बंदगी है मेरे हर आमालों में

सुकून पाता है 'क़मर' बज्म में तेरी आकर

वरना खो गया होता गम के अंधियालों में।

Teen Ghazalen

तूफाँ

ख्वाबों खयालों मे आने लगे हैं
दिल को मेरे सताने लगे हैं
मैं दूर जाऊँ तो जाऊँ कैसे
नजदीक इतना वो आने लगे हैं
समंदर में उतरकर देखा जो उसको
वो अंधेरे मुझे रास आने लगे हैं
जाके टिकती है कश्ती अब देखो कहाँ ?
धारा उल्टी है, तूफाँ भी आने लगे हैं।


याद

हर पल सताती है तेरी याद क्या करूँ
पहुँचती नहीं मंजिल तक फरियाद क्या करूँ
इक आस लगा रखी है जज्बात से तेरे
लोगों ने उसे भी कर रखा बरबाद क्या करूँ
झूम उठती है तबस्सुम जब तेरे लबों पर
हो जाता है दिल मेरा आबाद क्या करूँ?

तेरा अक्स

बस गया है जेहन में तेरा अक्स ऐसा
हर हरफों में अब बस तू ही दिखती है
ये नदिया ये झरने ये समंदर की लहरें
देखूँ चाहे जो भी सूरत तेरी ही उभरती है।
ऐसा कुछ है खास मेरे महबूब का जलवा
नज़र उठी भी नहीं, ग़ज़ल खुद ही बनती है।

तारा कितना उदास है!

       तारा कितना उदास है!       

जगमगाते नीड़ में वह

लगता कितनी भीड़ में वह

पर अकेला जल रहा वह, कौन उसके पास है?

तारा कितना उदास है! 

ज्योत्स्ना का साथ पाया

रात को मधुमय बनाया

इन क्षणों में पा लिया वह, जो न उसके पास है।

तारा कितना उदास है ?

हार की जीत

       मोहब्बत की रीति तुम क्या जानो!

       कैसी होती है प्रीति तुम क्या जानो!

       उलझे रहे तुम खनकती सदाओं में

       दिल का ये संगीत तुम क्या जानो!

       शौक है तुम्हें हर दम जीतने का

       हार की ये जीत, तुम क्या जानो!

       परवाना जलता रहा, तुम हंसते रहे

बनना किसी का मीत तुम क्या जानो!

दीवानगी

       जिन्दगी अब बेमानी सी लगती है

       एक अधूरी कहानी सी लगती है

दिल बेजार रूह बेताब तुझ बिन

दरिया कोई बिन पानी सी लगती है

बेच दूँ कैसे तेरी यादों का सरमाया

ये तो अनमोल निशानी सी लगती है।

देखता हूं जिधर बस तू ही नजर आता है

रूह भी अब तेरी दीवानी सी लगती है।

खूब निभाए हैं आदाबे मोहब्बत मैंने

तड़प तेरी अब सुहानी सी लगती है

कुछ शेर

1.      इक चिंगारी से ही आतिश जवाँ हो जाती है।

अमृत की इस बूँद से, ज़िन्दगी रवाँ हो जाती है।

दिल में गर हो जाए, मुहब्बत का ईमाँ पैदा,

कहानी बिन कहे, खुद ही बयाँ हो जाती है।

2.     उनकी शिकायत है कि मैं नशे में हूं

       होश में वो भी नहीं हैं, मानते नहीं।

       एक ही कश्ती पर अब दोनों हैं सवार,

       मैं जो डूबा! क्या उनका होगा, जानते नहीं।

3.     तुम न समझोगे मेरे दिल का मुकाम क्या है,

       बिन पिये क्या जानो मोहब्बत का जाम क्या है!

       सिमट आती है खलक छोटे से आंचल में,

       ये दुनिया व आसमां, सुबहो शाम क्या है!

4-     संगीत तुम्हारी हसरत है मैं दिल के तार बजाता हूँ

अपने अरमानों के मोती से मैं तेरा हार सजाता हूँ

5-     इक इक पल सदियों में बीता उसके इंतजार में

दिल यूँ बेताब था कि न था मेरे इख्तियार में

मचल रहा था तड़प के, अपना हाल सुनाने को

यार मेरा तो खोया था खिलौनों के बाजार में।

6.     उलझे रहते हैं अनसुलझे से सवालों में,

जागते रहते हैं, न जाने किन खयालों में,

सुकून पाते हैं, मेरी बज्म में शामिल होकर

नाम फिर भी लेते हैं मेरा, सताने वालों में।

7-    अब तो नाम भी उनका न लिखता हूँ न पढ़ता हूँ

      कि उनकी याद की शिद्दत को मैं कैसे सँभालूँगा

 

8-    गम न कर जो वे तेरे मीठे प्यार के न आभारी रहे

मोल हीरे का क्या समझें, जो काँच के व्यापारी रहे

 

9-     याद आता है हर पल वो बागबां

खून सींचा है जिसने चमन के लिए

सर झुकाते हैं उनके सम्मान में

जिंदगी जिसने दी है अमन के लिए

 

10-    गम इसका नहीं कि उतारा दिल में खंजर उसने

गम ये है कि बना लिया दिल को पत्थर उसने

दर्द की बेताबी का क्यों होता नहीं असर उस पर

कैसे महसूस किया था खुशियों का सागर उसने

भोर की ठंडी हवाएँ ही न रास आईं उसको

किया था वादा साथ चलने का उम्र भर उसने

स्वागत गीत

स्वागतम, स्वागतम स्वागतम स्वागतम

आप आए चमन में बहार आ गई

कोकिला गा उठी स्वागतम स्वागतम 

आप आए हृदय शतदल खिल गए

चिर-प्रतीक्षित तपस्या के फल मिल गए

मन के उपवन में बुलबुल चहकने लगी

भँवरे गाने लगे स्वागतम स्वागतम 

करने चरणों में अर्पित श्रध्दा सुमन

राह में झुक गया है सारा गगन

आके प्रकृति सुंदरी, हाथ जोड़े खड़ी

गा उठा है पवन स्वागतम स्वागतम 

आप आए हमें इक निधि मिल गई

एक अकिंचन को पारसमणि मिल गई

अब खुशियों की वर्षा है होने लगी

मन मयूर गा उठे स्वागतम स्वागतम।     

ऐसा क्यों होता है?

ऐसा क्यों होता है?

ऐसा मन में क्यों होता है कि- 

खेलूँ ऊँची-ऊँची लहरों के साथ,

तैरूँ उसके शिखर तक, और

फिर बिखर जाऊँ छोटी-छोटी बूँदें बन के!

भुला दूँ अपने व्यक्तित्त्व को,

मिटा दूँ अपने अस्तिस्व को,

समा जाऊँ! इस असीम, अथाह, अतल जल में।

ऐसा क्यों होता है?

 

ऐसा क्यों होता है कि-

उभर आती हैं सदाएँ सूनेपन में

जो दिख रहा है उसे देता हूँ सदा,

नहीं है कोई प्रतिध्वनि।

शीतल बयार झकझोरती है तन को, मन को!

सपने में खोया मन!

एहसास जगाती शबनमी छुवन

ऑंखों में तिरती मोतियों की चमक

विलीन हो जाती है असीम, अथाह, अंतस्तल में।

ऐसा क्यों होता है?

ऐसा क्यों होता है?

एक चिड़िया

उम्मीदों की छाँव में बैठी एक चिड़िया,

टुकुर-टुकुर ताकती है - जलती हुई धूप को।

चोंच में दबाए हुए छाँव की चादर,

खींच देना चाहती है उस छोर तक,

जहाँ से आती है धूप।

फड़फड़ाते पंख टकरा-टकराकर  उलझ जाते हैं चादर में। 

सितारों की छाँव में बैठी एक चिड़िया,

टुकुर-टुकुर निहार रही पूनम के चाँद को,

समेट लेना चाहती है उसकी पूरी शीतलता,

अपने अंतस में,

ताकि लड़ सके वह दोपहर की धूप से,

उस धूप से, जो खींच ले रही है उसके अंतस से

सारा रस। 

वह पाना चाहती है अपने खोए हुए रूप को,

उम्मीदों की छाँव में बैठी एक चिड़िया,

टुकुर-टुकुर ताकती है, जलती हुई धूप को।

साथी सो न, कर कुछ बात।

साथी सो न, कर कुछ बात।

       यौवन में मतवाली रात,

       करती है चंदा संग बात,

तारें छुप-छुप देख रहे हैं, उनकी ये मुलाकात।

साथी सो न, कर कुछ बात। 

झींगुर की झंकार उठी,

रह-रह, बारंबार उठी,

चकवा-चकवी की पुकार उठी, अब छोड़ो न मेरा हाथ।

       साथी सो न, कर कुछ बात। 

       लज्जा से है मुख को छुपाती,

       अधरों से मधुरस टपकाती,

विहँस रही मुरझाई पत्ती, तुहिन कणों के साथ।

साथी सो न, कर कुछ बात।

कवि-पत्नी की व्यथा

पत्नी जी अति प्रेम में विह्वल कह गईं दिल की बात!

हे प्रिय! क्या तुम दोगे मुझको कविता की सौगात!

पत्नी को खुश करने का यह अच्छा अवसर पाया,

फिर क्या था !

पति महोदय का कवि मन फड़फड़ाया,

सितारों का एक चक्कर लगाया,

प्रिया के मुखमंडल को निहारा,

प्रकृति से सुंदर रूपों को विचारा,

भावनाएँ साँचे में ढलने लगीं,

गीतों की कड़ियाँ निकलने लगीं,

कवि जी लग गए प्रिया का मन बहलाने,

हर प्रहर में एक -एक कविता लगे सुनाने,

कविता की स्रोतस्विनी फूट पड़ी।

पर यह क्या? पत्नी जी तो रूठ पड़ीं!

मुखमंडल पर भरकर तेज, बोलीं-

अरे! अब रात दिन कविता ही बनाओगे!

नींद से जगा-जगा कर सुनाओगे!

वैसे ही ज़िन्दगी में कहाँ आराम है?

घर में और भी ढेरों काम हैं।

अरे! मैं तो कभी-कभार एक दो लाइन सुनाने को बोली थी-

वह कौन सी मनहूस घड़ी थी, जो मैं अपना मुँह खोली थी।

मैंने कुछ मोती चुनने को कहा था - यह पत्थरों का ढेर नहीं।

मैंने सोया हुआ कवि जगाना चाहा था, सोया हुआ शेर नहीं।

मैंने सोया हुआ कवि जगाना चाहा था........, सोया हुआ शेर नहीं।