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Tuesday, December 12, 2017

प्यार


तेरी आमद से महक उठता है उपवन सारा
ये जहां लगने लगता है जन्नत से प्यारा।
मृग की कस्तूरी की भीनी सी खुशबू तू है
जहां भी देखूं हर सिम्त बस तू ही तू है।
अजब निराला व मतवाला है अंदाज़ तेरा
रूह के पर लगा होता है परवाज़ तेरा।
माँ की ममता में घुला रहता है पानी बनके
समाये माटी में तो चमके क़ुर्बानी बनके।
तू एक पल में ही खुद से बेगाना कर दे
तू एक पल में ही बेख़ौफ़ परवाना कर दे।
तुझसे महरूम होकर कोई जी सकता है क्या?
तू रूठ जाए तो ये फ़लक टिक सकता है क्या?
वक़्त को बांध ले मुट्ठी में है वो हस्ती तेरी
मौत को भी खुशनुमा बना देती है मस्ती तेरी।
तुम्ही ही हो जिससे हर घर मकान ज़िंदा है
तुम्हारे दम पे ही ज़मीनो आसमान ज़िन्दा है।
आंखों में समाए तो तू सबसे जुदा लगता है
एक अदना सा चेहरा भी खुदा लगता है।
लब पे आ जाये तो हर लफ्ज़ दुवा होती है
दिल की दुनिया की रूहानी  फ़िज़ा होती है
ऐ प्यार..
तेरे ही नूर से ही रोशन ये क़मर प्यारा
तेरे ही नूर से रौशन है ये जहां सारा।

Sunday, January 26, 2014

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Tuesday, October 16, 2012

जीवन यात्रा है


मैंने देखा जीवन की रवानी को
मैंने देखा पल-पल बढ़ती हुई कहानी को
चलते ही चलते मैंने नदिया से पूछ लिया-
यूँ कल-कल निनाद कैसे कर लेती हो ?
अपने जीवन में वेग कैसे भर लेती हो ?
उसने बताया, उसने समझाया-
मधुर ताप से मैंने अपने अंतस को है पिघलाया
विलग हुई हिमखंड से औ‘ चल पड़ी मैं यात्रा पर
क्योंकि जीवन यात्रा है।
छोड़ उसके तट को,
मैं चला, आगे बढ़ा
सहसा ठिठके पाँव, देखा- वृक्ष सब बिहँसे पड़े हैं।
प्रश्न पूछा, जीवन कैसे ? जबकि ये एकदम खड़े हैं
एक सुर में बोल उठे पेड़ सब सारी दिशा से-
हम खड़े हैं पर हमारी मुस्कुराहट डोलती है
हर दिशा में घूमकर वह प्राण सबमें घोलती है
बिहँसते हर प्राण में मैं कर रहा एक यात्रा हूं
क्योंकि जीवन यात्रा है।
घूमते फिरते चला मैं
पर्वतों के पार पहुंचा,
पर्वतों के पार पहंुचा बादलों के पास पहुंचा
तैरते बादल से पूछा-
हरीतिमा के देश में, तुमको किस दुख ने था घेरा
जो यहाँ एकांत निर्जन में बनाया अपना डेरा
विचरते रहते हो तुम, न ज्ञात तुमको पार है
चल रहा अंतस में तेरे क्यों ये हाहाकार है ?
सहसा चमकी एक विद्युत,
अपने अंतस की चमक से उसने तम का राज़ खोला
भावना के वेग में तड़पकर उसने ये बोला-
भार ढोता फिर रहा हूं
इस दिशा से उस दिशा तक
पार तो जाना नहीं है
मैं पिघलकर फिर बनंूगा
वेग नदी की भावना का
चल पड़ूंगा साथ उसके अपनी प्रिय यात्रा पर
क्योंकि जीवन यात्रा है।

Wednesday, March 7, 2012

होली -बनारसी भाषा में

आम के बउरवा स बउरायल मनवा होलिया में करयला धमाल।
भरि पिचकारी मारे प्रीतिया क रंगवा, गलवा में रगडे़ गुलाल।
भीगि गयल तन मन भींगल बसन सब अंखिया में छायल खुमार।
होलिया के रंगवा में डूबि गयल जियरा हियरा न रहल अब हमार।
इक रंग ऊपर दुसर रंग चढ़ि गयल अंग अंग में आ गइल बहार।
अइसन रंगवा में डूबल रहय मनवा न उतरय इ नसा इ खुमार।

Thursday, January 26, 2012

हम सौभाग्यशाली हैं

 



हम सौभाग्यशाली हैं
पाई हमने आजादी की हवा मुफ्त में
पाया हमने गणतंत्र मुफ्त में
हम सौभाग्यशाली मुफ्तख़ोर हैं।
इसीलिए आज
पाया है हमने गनतंत्र मुफ्त में।
वे जिन्होंने चुकाए थे दाम
आज उनसे हमारा क्या काम?
वे आँसू क्यों बहाते हैं?
वे क्या नहीं देखते?
हम कितने बिजी हैं
अरे दो दिन तो
उनके नाम पर फूल चढ़ाते हैं।
क्या सारा समय हम
उनके ही सपनोें को देखते रहें!
हमारी भी आँखें हैं
हम देश को अपने हिसाब से चलाएंगंे
अपने हिसाब से आगे बढ़ाएंगें
हम सौभाग्यशाली मुफ्तख़ोर हैं।
विकसित देश अपने आप ही पाएंगें
दुनिया वाले देखते ही रह जाएंगें।
हम सौभाग्यशाली हैं



सभी भारतवासियों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। 

Sunday, January 8, 2012

चुनाव आयोग का परदा



चुनाव के मौसम में
हाथियों पर परदा चढ़ाने के फरमान से तिलमिलाए
एक सज्जन ने मुझसे पूछा-
जनता ने तो इन हाथियों को पहले देख ही लिया है....
अब परदा डालने से क्या लाभ ?
जनता तो जान ही जाएगी कि परदे के पीछे क्या है… ?


मैंने कहा- भाई इतनी ज़रा सी बात भी नहीं समझ पाते हो ?
व्यर्थ में ही बवाल मचाते हो।
अरे ! यह परदा जनता के लिए थोड़ ही है,
जनता की आंखों पर और अक्ल पर तो पहले से ही परदा पड़ा है।
यह परदा है हमारे माननीय नेताओं के लिए
जो अब चुनाव क्षेत्र में आएंगे।
वे समझदार, इज्ज्तदार और दूरद्रष्टा महामानव
भला हाथियों को निर्वस्त्र कैसे देख पाएंगे ?
वे तो शर्म से ही मर जाएंगे।
फिर हम सरकार कहां से पाएंगे ?


जब चुनाव का मौसम उड़ जाएगा
वे अपने अपने सिंहासन पर विराजमान हो जाएंगे,
तब यह परदा हटा लिया जाएगा
और उन्हें समझा दिया जाएगा कि
अगले पांच वर्ष तक
ये हाथी निर्वस्त्र रहेंगे
कृपया इन क्षेत्रों से दूर रहें।


मैं चुनाव आयोग की समझ का कायल हो गया हूं
पर भीतर से थोड़ा घायल हो गया हूं,
बस एक निवेदन करना चाहता हूं कि-
हे आयोग देवता!
जनता के कुछ कपड़े हाथी बनवाने में बिक गए,
कुछ कपड़े हाथी को ढकवाने में खिंच जाएंगे।
कृपा कर एक महान कार्य कर दीजिए
जनता के बचे-खुचे कपड़े भी हर लीजिए,
और उन कपड़ों से बनवा लीजिए खूब बड़े-बड़े परदे
ढक दीजिए इस देश की संसद को और सभी विधानसभाओं को
ताकि दुनिया के सामने
बेपर्द न हो सके हमारे देश की अस्मत।
क्योंकि हमारे ये इज्ज्तदार नेता अक्सर वहां नंगे हो जाया करते हैं।
जनता का क्या है ?
वह तो अंधी है..
वह बिना परदे के भी रह लेगी तो क्या ?

Friday, October 21, 2011

कता-



सुकून खोजने न जाने किस किस दर पहुंचा।
सुकून आया जब लौट कर के घर पहुंचा।
दिल ही मरहम है खुद दिल के जख्मों का
इलाज की खातिर यूं ही शहर शहर पहंुचा।